फिरोजाबाद। संवाद करो, विवाद नहीं, क्योंकि विवाद से लड़ाई होती है और संवाद से समझौता होता है। यह उपदेश आचार्य निर्भय सागर महाराज ने छदामीलाल जैन मंदिर में प्रवचन के दौरान दिए।
उन्होंने धर्म और भगवान के प्रति श्रद्धा में लगने वाले दोषों की व्याख्या करते हुए कहा कि भगवान के बताए मार्ग पर संदेह करना, पूजा-भक्ति में सांसारिक इच्छाएं रखना, दीन-हीन लोगों एवं संत-महंतों को देखकर ग्लानि करना, गुरुओं की निंदा करना, गलत को स्वीकार करने में मूढ़दृष्टि रखना, दूसरों की निंदा-आलोचना करना, उन्हें धर्म से विचलित करना तथा घर, परिवार, समाज और देश के प्रति द्वेषभाव रखना धर्म में दोष लगाने के समान है। उन्होंने कहा कि जिनशासन की अप्रभावना कर अपनी प्रभावना करना भी दोष है।
आचार्यश्री ने कहा कि कालिकाल में पैसे और धंधे का महत्व बढ़ गया है, जबकि परमात्मा और धर्म का महत्व घट रहा है। पाप का महत्व बढ़ रहा है और पुण्य का घट रहा है, अचेतन का महत्व बढ़ रहा है और चेतन का घट रहा है। आज मनुष्य पुण्य चाहता है, लेकिन पाप का साथ दे रहा है और पाप का फल नहीं चाहता, जबकि पाप दिन-रात कर रहा है। यही कालिकाल की विडम्बना है। उन्होंने कहा पहला सुख निरोगी काया धर्म पुरूषार्थ से मिलती है। दूसरा सुख घर में हो माया अर्थ पुरूषार्थ से, तीसरा सुख कुलवंती नारी काम पुरूषार्थ से और चौथा सुख पुत्र हो आज्ञाकारी मोक्ष पुरूषार्थ से प्राप्त होता है। धर्म सभा में अजय जैन एडवोकेट, ललितेश जैन, संभव प्रकाश जैन, निमेष जैन, शैलेंद्र जैन शैली, विशाल जैन, अनुज जैन तुलसी विहार, हीरालाल जैन, पंकज जैन, सच्चा जैन, अजय जैन बजाज आदि मौजूद रहे।








