फिरोजाबाद। महावीर जिनालय, छदामी मंदिर में वैज्ञानिक संत आचार्य निर्भय सागर महाराज ने विवाह के आध्यात्मिक महत्व पर प्रकाश डालते हुए कहा कि भारतीय संस्कृति में विवाह करना एक धर्म है। विवाह से स्त्री और पुरुष दोनों का मन पवित्र रहता है और शारीरिक इच्छाओं की न्यायपूर्वक पूर्ति होती है। दोनों मिलकर दान, पूजा आदि धार्मिक कार्य करते हैं, इसलिए विवाह को व्यवहार धर्म माना गया है।
आचार्य श्री ने कहा कि स्त्री और पुरुष आंधे-लंगड़े के समान होते हैं और दोनों मिलकर इस जलते हुए संसार से पार होने का प्रयास करते हैं। पुरुष विषयांध होता है और स्त्री विकलांग के समान होती है, क्योंकि वह कहीं जा नहीं सकती। इसलिए दोनों की उपमा आंधे-लंगड़े से दी गई है। आचार्य श्री ने कहा कि कन्या का दान होता है और दान की हुई वस्तु पर अपना अधिकार नहीं रहता। इसलिए भारतीय संस्कृति में विवाह के बाद दोबारा कन्यादान नहीं किया जाता। वह धर्म मार्ग पर चलकर अपने आत्मकल्याण का प्रयास करती है।
हालांकि आज की दुनिया में इन परंपराओं में काफी परिवर्तन हो चुका है। धर्म सभा में अरुण जैन पीली कोठी, विनोद जैन मिलेनिय अजय जैन एडवोके संभव प्रकाश जैन, निमेष जैन, शैलेंद्र जैन, ललितेश जैन, पंकज जैन, अनुज जैन तुलसी विहार, हीरालाल जैन, अभय जैन, अशोक जैन तुलसी विहार, अजय जैन बजाज आदि मौजूद रहे।








