फिरोजाबाद। वैज्ञानिक संत आचार्य निर्भय सागर महाराज के सानिध्य में जैन धर्म बालबोध परीक्षा का आयोजन किया गया। जिसमें नगर की 15 जैन पाठशालाओं के लगभग साढ़े 300 विद्यार्थियों ने उत्साहपूर्वक भाग लिया। धर्मसभा में आचार्य श्री ने बच्चों को संस्कारों के महत्व से अवगत कराते हुए कहा कि संस्कारों से मानव जीवन मूल्यवान बनता है। गर्भ के संस्कार जीवन पर्यंत चलते हैं, जबकि जन्म के संस्कार भव-भवांतर तक साथ चलते हैं। कुसंस्कारों से बचाने और सुसंस्कारों से संस्कारित करने के उद्देश्य से ही पाठशालाओं का संचालन किया जाता है।
उन्होंने कहा कि मजबूत राष्ट्र, सुसंस्कारित समाज और श्रेष्ठ चारित्र निर्माण की आधारशिला पाठशाला है। माता-पिता द्वारा दिए गए संस्कार जीवन-निर्वाह का मार्ग दिखाते हैं, जबकि गुरु द्वारा दिए गए संस्कार आत्मकल्याण का मार्ग प्रशस्त करते हैं। आचार्यश्री ने सुसंस्कार की व्याख्या करते हुए कहा कि व्यक्तित्व का विकास, योग्यता का उद्घाटन, गुणों की प्राप्ति, दोषों का परिहार तथा निरंतर सुधार की ओर बढ़ना ही सुसंस्कार है। उन्होंने कहा कि किस्मत संपदा से नहीं, बल्कि संस्कारों से बदलती है। इसलिए बच्चों को आधुनिक शिक्षा के साथ धर्म, संस्कृति और संस्कारों की शिक्षा देना भी आवश्यक है।
आचार्य श्री ने कहा कि पर्यूषण पर्व के दौरान सभी जैन पाठशालाओं के शिक्षक-शिक्षिकाएं दसों दिन उपस्थित रहकर विद्यार्थियों को धार्मिक एवं संस्कारपरक शिक्षा प्रदान करेंगे। इस दौरान विनोद जैन मिलेनियम, अरुण जैन पीली कोठी, अजय जैन एडवोकेट, संभव प्रकाश जैन, निमेष जैन, शैलेंद्र जैन शैली, पंकज जैन, अनुज जैन तुलसी विहार, राजेश जैन, अशोक जैन तुलसी विहार, हीरालाल जैन, अभय जैन, अजय जैन बजाज आदि उपस्थित रहे।






