-जैन मंदिरों में विधि-विधान से हुई उत्तम त्याग धर्म की पूजा-अर्चना
फिरोजाबाद। सुहागनगरी के समस्त जैन जिनालयों में‘उत्तम त्याग धर्म’ की विशेष पूजा-अर्चना एवं धार्मिक अनुष्ठान पूरी श्रद्धा व उल्लास के साथ संपन्न हुए। इस अवसर पर श्रद्धालुओं ने अपनी शक्ति अनुसार दान देने और परिग्रह (संग्रह) की प्रवृत्ति को कम करने का संकल्प लिया।
शहर के प्रमुख जैन मंदिरों में सुबह से ही भगवान जिनेन्द्र देव का अभिषेक, शांतिधारा और विशेष पूजन के लिए गुरु भक्तों का सैलाब उमड़ पड़ा। नगर के सभी जैन मंदिरों में उत्तम त्याग धर्म की जय के जयकारे गूंजते रहे। पूजन विधान के दौरान अर्घ्य समर्पित करते हुए भक्तों ने त्याग धर्म को अपने व्यावहारिक जीवन में उतारने का दृढ़ नियम लिया। महावीर जिनालय ने वैज्ञानिक संत आचार्य निर्भय सागर महाराज का ससंघ सानिध्य श्रद्धालुओं को प्राप्त हुआ। इस दौरान गुरु भक्तों ने परम पूज्य आचार्य श्री के पाद प्रक्षालन (चरण धोने) का सौभाग्य प्राप्त किया।
पाद प्रक्षालन के पश्चात श्रद्धालुओं ने गुरुदेव के श्रीचरणों में नतमस्तक होकर उनका मंगल आशीर्वाद ग्रहण किया और उनके मुखारविंद से अमृतमयी देशना का श्रवण किया। आचार्य श्री ने श्रद्धालुओं को संबोधित करते हुए कहा कि, संग्रह मनुष्य को तृष्णा की ओर ले जाता है, जबकि त्याग उसे मोक्ष मार्ग की ओर अग्रसर करता है। परिग्रह का परिमाण करना ही सुखी जीवन की कुंजी है। जब तक मनुष्य अपनी आवश्यकताओं को सीमित नहीं करेगा, तब तक उसे सच्चे सुख की अनुभूति नहीं हो सकती।
बाहुबली दिगम्बर जैन जिनालय में गुरु मां ने उत्तम त्याग धर्म का वर्णन करते हुए कहा कि त्याग केवल धन-संपत्ति का नहीं, बल्कि मन के विकारों और अति-संग्रह की भावना को छोड़ने का नाम है। अपनी वैध वस्तुओं में से निःस्वार्थ भाव से समाज और जरूरतमंदों को दान देना ही उत्तम त्याग है। परिग्रह को कम करके ही आत्मा को वास्तविक शांति प्राप्त हो सकती है।









