फिरोजाबाद। नारी शक्ति, लक्ष्मी, शोभा, स्वाभिमान और सृष्टि की आधारशिला है। नारी ही जननी, वामांगिनी तथा दुर्गा-चंडी का स्वरूप है। भारतीय संस्कृति में नारी को सर्वाेच्च सम्मान दिया गया है, किंतु आधुनिक समय में कुछ युवतियां विवाह जैसी पवित्र संस्था से दूर रहकर, बिना विवाह के संबंधों की ओर आकर्षित हो रही हैं, जो परिवार, समाज और संस्कृति के लिए विनाशकारी प्रवृत्ति है, यह उपदेश आचार्य निर्भय सागर महाराज ने छदामीलाल जैन मंदिर में धर्मसभा के दौरान दिए।
उन्होंने कहा कि नारी स्वभावतः प्रेम, विश्वास, सुरक्षा, सम्मान, सहयोग तथा आत्मीयता की अपेक्षा रखती है। उन्होंने नारी के विभिन्न स्वभावों का वर्णन करते हुए कहा कि जो नारी स्वादिष्ट एवं विविध प्रकार के भोजन बनाने और उसी में रुचि रखती है, वह रसवंती नारी कहलाती है। जो सदैव श्रृंगार और सौंदर्य-सज्जा में रत रहती है, वह चंद्रमुखी नारी कहलाती है। जिसके चेहरे पर सदैव क्रोध और प्रतिशोध झलकता रहता है वह ज्वाला मुखी नारी कहलाती है। समाज की वास्तविक धरोहर सुलक्षणा नारी होती है, जो मधुरभाषी, परिवार के प्रति वात्सल्य रखने वाली, अहंकार से रहित, दक्ष, शालीन, गुणग्राही दृष्टि रखने वाली तथा ज्ञान, ध्यान, संयम और त्याग की मूर्ति होती है।
आचार्य श्री ने सुलक्षणा नारी के छह गुणों का उल्लेख करते हुए कहा कि वह कार्य करने में मंत्री के समान बुद्धिमान, व्यवहार में दासी के समान विनम्र, दाम्पत्य जीवन में देवांगना के समान सौम्य, भोजन कराने में माता के समान स्नेहमयी, क्षमा में धरती के समान सहनशील तथा धर्माचरण में सदैव मर्यादित रहती है। ऐसी नारी केवल परिवार ही नहीं, बल्कि पूरे कुल, समाज और देश के उत्थान का कारण बनती है। धर्मसभा में चातुर्मास समिति के अध्यक्ष निमेष कुमार जैन, शैलेन्द्र जैन, सम्भव प्रकाश जैन, अनिल जैन, हीरालाल जैन, अभय जैन, सौरभ जैन, विनोद कुमार जैन मिलेनियम, अजय एड, मीडिया प्रभारी अजय जैन बजाज आदि मौजूद रहे।








