-44 जिनालयों की भक्तों ने पैदल वंदना कर अर्जित किया पुण्य लाभ
-जिनालयों में उत्तम ब्रह्मचर्य व रत्नत्रय धर्म की हुई विशेष पूजा-अर्चना
फिरोजाबाद। जैन समाज के सबसे बड़े एवं पावन दशलक्षण महापर्व का समापन धार्मिक उत्साह, भक्ति और आत्म-साधना के वातावरण के साथ हुआ। महापर्व के अंतिम दिन नगर के सभी जिनालयों में दसवें लक्षण उत्तम ब्रह्मचर्य धर्म की विशेष पूजा-अर्चना की गई। धर्मशास्त्रों के अनुसार, उत्तम ब्रह्मचर्य का अर्थ अपनी आत्मा में लीन होना तथा संयमित और शुद्ध आचरण का पालन करना है। इसके साथ ही आज श्रद्धालुओं ने 10 वें तीर्थंकर प्रभु अनंतनाथ जिनदेव का भक्तिभाव के साथ निर्वाण महोत्सव मनाया तथा रत्नत्रय व्रत के अंतर्गत सम्यक ज्ञान धर्म की भी सामूहिक रूप से आराधना की।
दशलक्षण पर्व के अंतिम दिन नगर के सभी 44 जिनालयों में सुबह से ही वंदनार्थियों और श्रद्धालुओं का अपार सैलाब उमड़ पड़ा। बच्चों से लेकर बुजुर्गों तक, सभी धवल (सफेद) वस्त्र धारण कर जिनेंद्र प्रभु के दर्शन हेतु आतुर नजर आए। श्रद्धालुओं ने अपनी-अपनी शक्ति और भावों के अनुसार नगर के विभिन्न जिनालयों की पैदल वंदना कर पुण्य लाभ अर्जित किया। मंदिरों में घंटों-घड़ियालों की ध्वनि, चंवर ढुराते भक्तों का उल्लास और उत्तम ब्रह्मचर्य धर्म की जय तथा भगवान अनंतनाथ स्वामी की जय के जयकारों से पूरा नगर धर्ममय हो गया।

वैज्ञानिक संत आचार्य निर्भय सागर महाराज कहा कि उत्तम ब्रह्मचर्य जीवन का अंतिम और सर्वाेच्च सोपान है। अपनी इंद्रियों को वश में रखना और आत्मा के निज स्वरूप में लीन होना ही सच्चा ब्रह्मचर्य है। शुद्ध आचरण ही मनुष्य को देवत्व की ओर ले जाता है। गुरु मां आर्यिका, विजयमती माता ने सम्यक दर्शन, सम्यक ज्ञान और सम्यक चरित्र मोक्ष मार्ग की आधारशिला हैं। जब तक जीवन में संयम और सम्यक ज्ञान का प्रकाश नहीं होगा, तब तक आत्मा का कल्याण संभव नहीं है।









