फिरोजाबादं। वैज्ञानिक संत आचार्य निर्भयसागर महाराज ससंघ के सानिध्य में छदामी लाल जैन मंदिर में प्रतिदिन ज्ञान की गंगा बहा रही। आचार्य श्री ने धर्मसभा में शिक्षक दिवस पर कहा कि जो अनर्थ से बचाये परमार्थ में लगाये वही सच्चा शिक्षक है। शिक्षक को अनुभवी, शान्तिप्रिय, निर्लाेभी, मृदुभाषी, सहनशील, गम्भीर और चारित्रवान होना चाहिए। अनुभवहीन ड्राइवर गाड़ी को गड्डे में गिरा देता है। अनुभवहीन किसान खेती को बर्बाद कर देता है और अनुभवहीन शिक्षक शिष्यों के भविष्य को बर्बाद कर देते हैं। शिक्षक जलता हुआ ज्ञान का दीपक हैं, जो शिष्य के बुझे दीपक को जला देता है। जैन धर्म में उपाध्याय परमेष्ठी को शिक्षक कहते है। जो शिक्षा दे वही शिक्षक है माता पिता और गुरु शिक्षा देते है अतः वे भी गुरु हैं। गुरु शिष्य का सम्बन्ध श्रृद्धा की डोर से बंधा होता है । गुरु श्रृद्धा और ज्ञान के नेत्र शिष्यों के खोल देते हैं। शिष्य को सद्गुरू मिल जाना सौभाग्य की बात है। सद्गुरू शिष्य को भी गुरू बनाना चाहते हैं और स्वयं प्रभु बनना चाहते हैं। जो गुरू शिष्य को हमेशा शिष्य ही बनाये रखना चाहता है और भविष्य में गुरू बनने के योग्य नहीं बनाता वह सच्चा गुरू नहीं है। सच्चा गुरू अपने शिष्य को स्वयं से भी अधिक योग्य बनाना चाहता है। गुरु रूपी सूर्य शिष्य रूपी कमल को खिला देता है। बिना गुरू के शिष्य का विकास असम्भव है। धर्म सभा में विनोद मिलेनियम, अरुण जैन पीली कोठी, संभवप्रकाश जैन, निमेष जैन, शैलेंद्र शैली, राजेश जैन आइडिया, पंकज जैन, अनुज जैन तुलसी विहार, हीरालाल जैन, अभय जैन, अजय जैन बजाज आदि मौजूद रहे।






